बंदूक से संविधान तक: पूर्व माओवादी नेता भूपती को गोंडवाना विश्वविद्यालय में नई जिम्मेदारी
“तीन महीने के करार पर समन्वयक नियुक्ति; आदिवासी क्षेत्रों में PESA और वनाधिकार कानून की जानकारी पहुंचाने की होगी जिम्मेदारी”
गडचिरोली | प्रतिनिधी,
चार दशक से अधिक समय तक माओवादी आंदोलन से जुड़े रहे और वरिष्ठ माओवादी नेता के रूप में पहचान रखने वाले मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपती के जीवन में अब एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। अक्टूबर 2025 में आत्मसमर्पण करने के बाद भूपती को अब गोंडवाना विद्यापीठ, गडचिरोली में आदिवासी अधिकारों से संबंधित कार्य के लिए समन्वयक की जिम्मेदारी दी गई है।
भूपती की नियुक्ति विद्यापीठ के ‘एकल’ कार्यक्रम के अंतर्गत तीन महीने के करार पर की गई है। इस दौरान उन्हें प्रतिमाह 30 हजार रुपये मानधन दिया जाएगा। उनका कार्य मुख्यतः आदिवासी गांवों में जाकर ग्रामसभा की कार्यप्रणाली को मजबूत करना तथा पेसा (PESA) और वनाधिकार कानून के तहत ग्रामीणों को उपलब्ध अधिकारों की जानकारी देना बताया गया है।
पुलिस की सिफारिश, चयन समिति ने किया चयन
पुलिस अधीक्षक एम. रमेश के अनुसार, आत्मसमर्पण के बाद भूपती ने आदिवासी समाज के लिए काम करने और अपने अनुभव का उपयोग करने की इच्छा व्यक्त की थी। इसी दौरान विद्यापीठ में आदिवासी अध्ययन एवं प्रशिक्षण से संबंधित अवसर की जानकारी सामने आई। इसके बाद उनका नाम विद्यापीठ प्रशासन तक पहुंचाया गया।
भूपती ने अन्य स्थानीय युवाओं के साथ इस पद के लिए आवेदन किया। अगस्त 2026 में हुई प्रक्रिया और साक्षात्कार के बाद चयन समिति ने उनका चयन किया। विद्यापीठ के कुलगुरु डॉ. प्रशांत बोकारे ने उनके अनुभव और आदिवासी क्षेत्रों की समझ को देखते हुए नियुक्ति की पुष्टि की।
अब ग्रामसभाओं के बीच काम करेंगे
नई जिम्मेदारी के तहत भूपती गांवों में जाकर ग्रामसभाओं के कामकाज की निगरानी और मार्गदर्शन करेंगे। इसके साथ ही आदिवासी नागरिकों को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की जानकारी देने, वनाधिकार के दावों के दस्तावेजीकरण में सहायता करने तथा ग्रामसभा, नागरिकों और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करने का काम भी प्रस्तावित है।
जिस आंदोलन से जुड़े रहे, उसी क्षेत्र में अब संवैधानिक रास्ते की बात
भूपती ने चार दशक से अधिक समय माओवादी आंदोलन में बिताए। अक्टूबर 2025 में उन्होंने गडचिरोली में सुरक्षा बलों और प्रशासन के समक्ष 60 से अधिक अन्य माओवादी सदस्यों के साथ आत्मसमर्पण किया था। इस दौरान बड़ी संख्या में हथियार भी जमा किए गए थे।
आत्मसमर्पण के बाद भूपती ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से आदिवासी समाज के लिए काम करने की बात कही है। फरवरी 2026 में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने माओवादी आंदोलन की विफलताओं पर भी बात करते हुए शेष सदस्यों से हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक मुख्यधारा में शामिल होने की अपील की थी।
नियुक्ति ने खड़े किए कई सवाल
भूपती को विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी दिए जाने के फैसले ने एक साथ कई सवाल भी खड़े किए हैं। क्या पूर्व उग्रवादी नेतृत्व का अनुभव अब आदिवासी अधिकारों के संवैधानिक संघर्ष में उपयोगी साबित होगा? क्या तीन महीने की यह नियुक्ति केवल पुनर्वास का प्रतीक है या इसे आगे स्थायी सामाजिक मॉडल में बदला जाएगा?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस अवधि के अंत में भूपती के काम का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाएगा? कितने गांवों में ग्रामसभाओं को प्रशिक्षण मिलेगा, कितने वनाधिकार दावों में सुधार होगा और आदिवासी नागरिकों को वास्तविक लाभ कितना मिलेगा—इनका सार्वजनिक मूल्यांकन होना जरूरी है।
साथ ही, माओवादी हिंसा से प्रभावित परिवारों और स्थानीय आदिवासी समाज की राय को भी इस पूरे प्रयोग में महत्व देना होगा।
भूपती का बंदूक से संविधान तक का सफर निश्चित रूप से असाधारण है; लेकिन इस कहानी की असली परीक्षा अब शुरू होती है—क्या चार दशक का अनुभव वास्तव में आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करने में बदल पाता है?
